एक शहीद सैनिक …जो मरने के बाद आज भी करता है सरहद की सुरक्षा,सेना आज भी देती है सैलरी

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 भारतीय पुलिस हो या सेना, इन जैसे सतर्क और बेहद संजीदा अमले में अंधविश्वास की कोई जगह नहीं होती. लेकिन ये कहानी है भारतीय सेना के विश्वास की, जो वास्तविक होकर भी अविश्वसनीय है.

आज हम आपको एक ऐसे सैनिक के बारे में बताएंगे जो मरते दम तक देश की रक्षा करता रहा. आपको जानकर हैरानी होगी कि एक ऐसा सैनिक है जो मरने के बाद भी सरहद की सुरक्षा में लगा हुआ है. चलिए बताते हैं आखिर कौन था वो वीर जवान-
3 अगस्त 1941 को पंजाब के कपूरथला जिला के ब्रोंदल गांव में जन्में हरभजन सिंह लोगों के लिए किसी कैप्टन से कम नहीं थे. इन्हें लोग कैप्टन बाबा हरभजन सिंह कहते हैं. बता दें कि कैप्टन बाबा ने 4 अक्टूबर 1968 में देश को अलविदा कह दिया था.  गहरी खाई में गिरने से हरभजन सिंह शहीद हो गए थे.
दरअसल, लोगों का आज भी मानना है कि बाबा कैप्टन शहीद होने के बाद भी सीना ताने देश की सुरक्षा में तैनात हैं. हालांकि चीन के  सैनिकों ने खुद कहा है कि उन्होंने बाबा कैप्टन को घोड़े पर सवार होकर सरहदों की गश्त करते हुए देखा  है. बाबा की आत्मा से जुड़ी बातें भारत ही नहीं चीन की सेना भी बताती है. चीनी सिपाहियों ने भी, उनको घोड़े पर सवार होकर रात में गश्त लगाने की पुष्टि की है.
बता दें कि  दिस वक्त कैप्टर हरभजन का निधन हुआ उस दौरान कैप्टन  ती से चार दिन तक लापता हो गए थे. लापता होने के बाद वह अपने दोस्त प्रीतम सिंह के सपने में आकर उन्हें अपने बॉडी  की जानकारी दी और बताया कि वे कहां है.  हालांकि इस बात पर किसी को भरोसा नहीं हुआ लेकिन जब वाकई उस जगह उनका शव बरामद हुआ तो लोगों को प्रीतम की बात पर यकीन हो गया.
बाद में उस जगह बाबा की  समाधि बना दी  गई. बाबा के मंदिर में बाबा के जूते और बाकी सामान रखा गया. बाबा के  बिस्तर पर कीचड़ से सने जूते के निशान होते हैं. इस हर कोई देखकर हैरान हो जाता है.हर साल हजारों लोग यहां दर्शन करने आते हैं. उनकी समाधि के बारे में मान्यता है कि यहाँ पानी की बोतल कुछ दिन रखने पर उसमें चमत्कारिक गुण आ जाते हैं और इसका 21 दिन सेवन करने से श्रद्धालु अपने रोगों से छुटकारा पा जाते हैं.

आपको बता दें कि आज भी बाबा हरभजन सिंह को बाकी सैनिकों की तरह सैलरी दी जाती है. सेना के पेरोल में आज भी बाबा का नाम लिखा हुआ है. सेना के नियमों के अनुसार ही उनकी पदोन्नति भी होती है. अब बाबा सिपाही से कैप्टन के पद पर आ चुके हैं. हर साल उन्हें 15 सितंबर से 15 नवंबर तक दो महीने की छुट्टी दी जाती थीं और बड़ी श्रद्धा के साथ स्थानीय लोग और सैनिक एक जुलुस के रूप में उनकी वर्दी, टोपी, जूते और साल भर का वेतन दो सैनिकों के साथ, सैनिक गाड़ी में नाथुला से न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन लाते. वहाँ से डिब्रूगढ़ अमृतसर एक्सप्रेस से उन्हें जालंधर (पंजाब) लाया जाता. गाड़ी में नाम का टिकट भी बुक किया जाता. यहाँ से सेना की गाड़ी उन्हें उनके गाँव तक छोडऩे जाती. वहाँ सब कुछ उनके मां को सौंपा जाता फिर उसी ट्रेन से उसी आस्था और सम्मान के साथ उनके समाधि स्थल वापस लाया जाता. लेकिन कुछ साल पहले इस आस्था को अंधविश्वास कहा जाने लगा, तब से यह यात्रा बंद कर दी गई.

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